poetry

लाल बिंदी

नदी में बहती हुई बिंदी कभी पथरो से टकरा कर घायल हुई

तो कभी झरने के पानी को पी कर निहाल हुई

बहते हुए पत्ते पे कभी सवार हुई

कही अटकी तो कभी पार हुई

उस हिरे के टुकड़े को जड़ लिया खुद पे, तो भीग के भी चमक उठी

पंछीओ ने उसकी खूबसूरती को पाना चाहा तो

सभी पंछीओ में तकरार हुई

आखिरी में लगी हाथ एक गौरैया के

तो गौरैया उसे उड़ा ले गई

सब उसे लेकर उड़े ऊंचे से ऊंचे

तो भारी बरसात हुई

सब रंग गए उस बिंदी के रंग में, पंछी, नदी, और आसमान भी

तो वो मुस्कुराई और बोली देखो पूरी दुनिया लाल गई |

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